भरत साह
ये कुछ सवाल हैं उन मधेशीयों से जो दार्जिलिंगवालों को नेपाली कहकर सम्बोधित करने पर काठमाण्डुवालों को दोषी ठहराते हैं तथा उन्हें दो-मुहा होने का आरोप लगाते हैं :-
दार्जिलिंग/सिक्किम के लोग अपने आपको यदि गर्व से भारतीय नेपाली बुलाते हैं तो इसमें क्या बुराई है ? वो अपने आपको क्या कहकर सम्बोधित करते हैं ये हम मधेशीयों के क्षेत्राधिकार में आता है या उन्हीं भारतीय लोगों के ? इसमें काठमाण्डु के लोगों की ग़लती क्या है यदि जो पहचान दार्जिलिंग वालों को क़बूल है उसी पहचान से उन्हें सम्बोधित करने में ? इसमें मधेशीयों को लाल-पीला होने की क्या आवश्यकता है कि पहाड़ी लोग मधेशीयों के बजाए दार्जिलिंग/सिक्किम इत्यादि के लोगों को नेपाली पहचान में आसानी से स्वीकार कर लेते हैं ?
अगर आप अभी भी ये मानते हैं कि दार्जिलिंगवाले अपने आपको नेपाली नही बुलाते और फ़लाने फ़लाने नामों से वो अपने आपको सम्बोधित करते हैं तो ये आपका भ्रम है। क्योंकि नेपाली पहचान आप माने या न माने दार्जिलिंग/सिक्किम तथा अन्य लाखों भारतीय लोगों के साथ इस क़दर जुड़ा हुआ है कि मानो ये पहचान उनके ख़ून में हो, नस नस में बहती हो । और उन्हे इस बात का मलाल नहीं बल्कि गर्व है कि वो भारतीय भी है और नेपाली भी । दूसरे शब्दों में कहा जाए तो वो भारतीय नेपाली हैं । भारतीय उनकी राष्ट्रीय पहचान है तथा नेपाली उनकी सामुदायिक या जातीय पहचान।
चाहे अखिल भारतीय गोर्खा लीग के मदन तामंग रहे हों या गोर्खा जनमुक्ति मोर्चा के सुभाष घिसिंग, या अन्य कोई भी भारतीय “गोर्खा” समुदायका प्रभुत्वशाली व्यक्ति, इनके किसी न किसी भाषण को आप युट्युब पर सुन सकते हैं जिसमें वो अपने भारतीय समुदायको “नेपाली” कहकर भी सम्बोधित करते हैं, “गोर्खा” और “नेपाली” पहचान में भेदभाव किये बग़ैर। इस बातको पुख्ता वो संस्थाएँ करती हैं जिनके नाम बाक़ायदा “भारतीय नेपाली” से भारत में पंजीकृत हैं, जो कि पूरे भारत में अनेक हैं जो निरन्तर सांस्कृतिक कार्यक्रम करते रहते हैं। वो केवल नेपाल के “नेपाली” लोगों के लिये नही बने हैं बल्कि भारत के नेपाली लोगों के लिये भी कार्यरत हैं। उन संस्थाओं का मधेशीयों के सांस्कृतिक कार्यक्रम से लेना देना नहीं रहता है।
छलावे के लिये उन्हें नेपाली मीडिया द्वारा पिछले कुछ समय से कहा जाने लगा है – तिनीहरू “नेपालीभाषी” हुन् तर नेपाली होइनन् नि ! मानो कोई पंजाबीभाषी हो लेकिन पंजाबी ना हो, कोई बांगलाभाषी हो अपितु बंगाली ना हो ! ये छलावा दरअसल हमारे देश की कथित राष्ट्रीयता “नेपाली” के जातीय पक्षों को उजागर होने से बचाने के लिये है ताकि निरन्तर मधेशी लोग किसी दूसरे की पहचान के अन्दर समाहित होने के लिये प्रयासरत रहे तथा जिसके बदौलत हमेशा असली नेपाली और नक़ली नेपाली यानि असली नागरिक और नक़ली नागरिक का भेद बना रहे और जिससे हीनताबोध से ग्रसित रहे मधेशी अपने आपको राष्ट्रीय भावना से अलग-थलग महसूस करके।




