हुलाकी न्यूज, काठमाडौं ९ पुस । सदभावना पार्टीका अध्यक्ष राजेन्द्र महतोले काँग्रेस–एमाले–एमाओवादीमा रहेका मधेशी, आदिवासी–जनजाति नेता तथा संसदहरुलाई पार्टी छोडेर आन्दोलनमा आउन आग्रह गरेका छन् ।
बुधबार बीरगंजबाट सम्पूर्ण नेता तथा संसदहरुलाई पत्र पठाउँदै महतोले अहिले पार्टीको परिधिमा रहनुभन्दा पनि पार्टीभन्दामाथि उठेर आन्दोलनमा आउन आग्रह गरेका छन् ।
तीन पृष्ठ लामो पत्रमा महतोले आन्दोलनको बारे जानकारी गराउँदै आन्दोलनमा एकीकृत भएर लाग्नु आवश्यक रहेको दोह्रयाएका छन् ।
महतोले पठाएको पत्र जस्ताको त्यस्तै
महोदय,
पिछले चार महीने से पूरा मधेश आन्दोलित है । नए संविधान में अपने अधिकार को सुनिश्चित कराने के लिए संघर्ष कर रही मधेश की जनता के प्रतिनिधि होने के कारण उनकी पीडा को, उनके दर्द को, उनकी वेदना को आप भी भलि भांति समझ रहे होंगे ।
चार महीने के आन्दोलन और ५५ से अधिक मधेशी जनता की शहादत इतिहास के पन्नों में सिमट कर ना रह जाए इसलिए डेढ करोड मधेशी जनता की भावना को समेटते हुए आपको यह पत्र लिख रहा हूं ।
चार महीने के लम्बे संघर्ष के दौरान मधेशी जनता पर हुए राज्य आतंक के चरम दमन की कहानी आपसे छुपी हुई नहीं है। आपके अपने लोगों को माथे में गोलियां मारी गई हैं । गोलियों से उनका सीना छलनी कर दिया गया है । लेकिन आप खामोश रहे। आपके समर्थन से बनी सरकार के द्वारा ही आपके क्षेत्र की जनता के साथ अन्याय और अत्याचार की सारी सीमाएं लांघ दी गई है । लेकिन आप फिर भी खामोश रहे ।
आपके क्षेत्र की जनता पिछले चार महीनों में लगभग हर रोज ही राज्य आतंक का शिकार होती रही और आपकी खामोशी भी बरकरार रही ।
क्या कभी आपको मधेश के रोते बिलखते लोगों की चीखें नहीं सुनाई पडी ? क्या कभी आपको अस्पतालों में चित्कार रहे हजारों घायल आन्दोलनकारियों के दर्द का एहसास नहीं हुआ ? क्या कभी आपको शहादत देने वाले परिवारों में छाए मातम पर ममता नहीं आई? मुझे पूरा विश्वास है ऐसा जरूर हुआ होगा ।
इन सब बातों पर आपके दिल में भी दर्द अवश्य हुआ होगा। आपकी आंखें भी जरूर भर आई होंगी । लेकिन अपनी पार्टी के अनुशासन ने आपके इस दर्द के एहसास को रोक लिया होगा । अपने पार्टी के आदेश के कारण ही आपकी आंखों में आई आंसू रूक गए होंगे । आपके पार्टी के
भीतर भी आपके साथ किस कदर भेदभाव हो रहा है कि अपनी जनता का दुख दर्द भी नहीं बांट पा रहे हैं ।
पार्टी की परिधि में बंधे होने के कारण मधेशी, थारू, जनजाति, दलित, मुसलमान आदि जनता के साथ भेदभाव वाले संविधान पर आपको हस्ताक्षर करने को मजबूर होना पडा। संविधान जारी होने से पहले निश्चित रूप से आपने मधेशी, थारू, जनजाति, दलित के पक्ष में आवाज उठाया होगा लेकिन संविधान निर्माण के अन्तिम चरण में जब हस्ताक्षर करने की बारी आई तब आपकी पार्टी ने आपकी आवाज को उभरने से पहले ही दबा दिया, आपकी भावना संविधान में समेटे जाने से पहले ही उसे कुचल दिया गया और जनता के लिए बनाए जाने के स्थान पर आपको ऐसे संविधान पर हस्ताक्षर करने को मजबूर कर दिया गया जो कुछ पार्टी के शीर्ष नेताओं के स्वार्थ में बनाया गया था। संविधान जारी करने की सारी प्रक्रियाएं रद्द करते हुए, बिना किसी बहस और बिना किसी चर्चा के संविधान को जारी कर दिया और आपकी एक नहीं सुनी गई ।
मधेश में इसका कडा विरोध होने और ५५ लोगों की शहादत के बाद तीन बडी पार्टियां संविधान संशोधन को तैयार हो गई। आपको भी भरोसा दिलाया गया कि आन्दोलनकारी पक्षों की सहमति पर ही संविधान संशोधन विधेयक लाया जाएगा। तीनों बडे दल ने अपनी पार्टी में भी और सामूहिक रूप से भी आधिकारिक निर्णय किया कि आन्दोलनरत पक्षों को विश्वास भरोसा में लेकर, उनकी सहमति में ही संविधान संशोधन विधेयक लाया जाएगा। इससे मधेशी जनता और आन्दोलनरत पक्षों में भी सहमति होने की उम्मीद की एक किरण दिखाई दी ।
पार्टी के भीतर ही आपका संघर्ष और आन्दोलन के पक्ष में आपके द्वारा की गई वकालत का भी यह असर था । ऐसा लगा सरकार और तीनों दल मधेशी थारू जनता की भावना का सम्मान करेंगे। सहमति का वातावरण बनने की आस लिए मधेशी जनता काठमाण्डू की तरफ आशा भरी निगाहों से देखने लगी । लेकिन सबकी उम्मीदों पर पानी फिर गया जब सरकार ने आन्दोलनरत पक्षों से बात किए बिना ही संविधान संशोधन के विधेयक को मधेशी मोर्चा के विरोध के बावजूद जबरन पेश कर दिया गया ।
तीन दल के शीर्ष नेताओं की नीयत का पर्दाफाश हो गया। आन्दोलनरत मधेशी मोर्चा और मधेशी जनता सभी ठगी हुई महसूस कर रही है । ऐसे में मधेशी जनता के पास संघर्ष को निरन्तरता देने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह गया है । जनता अपने अधिकार के इस महासंग्राम में अन्तिम धक्का देने की सोच बना चुकी है ।
आक्रोशित व उद्वेलित जनता सडकों पर “आर–पार“ की लडाई के लिए कमर कस चुकी है । डेढ करोड मधेशी जनता की एक ही आवाज है “अभी नहीं तो कभी नहीं।“ जन नेता होने के नाते जनता की भावना का सम्मान करना आपका भी कर्तव्य है। जन प्रतिनिधि होने के नाते जनता के संघर्ष में कंधे से कंधा मिलाना आपका भी फर्ज बनता है । डेढ करोड मधेशी जनता के अधिकार के इस लडाई में आपको भी जनता के बीच रहना चाहिए यही जनता की इच्छा और आपसे अपेक्षा है ।
मैं उन्हीं डेढ करोड मधेशी, थारू, दलित, जनजाति, मुस्लिम आदि जनता की ओर से आपसे अपील करता हूं कि यह समय पार्टी भक्ति दिखाने का नहीं है । यह समय पार्टी की परिधि में बंधे रहने का नहीं है । यह समय काठमांडू में रहने का नहीं है । यह समय है जनता के बीच में आकर उनकी आवाज को बुलन्द करने का, उनके संघर्ष में साथ निभाने का यह समय शहीदों के सपने को साकार करने का है । आईए आप हम सभी मिलकर मधेश के अधिकार की लडाई में सम्मिलित हों, मधेश की जनता, आपके क्षेत्र की जनता, आपकी अपनी जनता मधेश में आपका इंतजार कर रही है । आईए हम सभी मिल कर संकल्प लें कि मधेशी जनता की भावनाओं को समेटते हुए सरकार और तीन दलों के समक्ष जो ११ बूंदे मांग रखी गई है उस को पूरा किए बगैर हम एक कदम भी पीछे नहीं हटेंगे । हमारा अधिकार हम लेकर रहेंगे ।
धन्यवाद ।
………………………..
राजेन्द्र महतो
राष्ट्रिय अध्यक्ष
मिति : २०७२ पौष ८, वीरगंज




