कञ्चना झा

अजीबो गरीब स्थिति है, चार महीना होने को है लेकिन समस्या समाधान के बदले और जटिल बनता जा रहा है । संविधान प्रति असन्तुष्टी व्यक्त करते हुए मधेश में आन्दोलन शुरु भी नहीं हुआ था और राजधानी के व्यापारी सब अच्छे दिन आने का इन्तजार करने लगे । किराना वालों ने दाल, तेल छुपा लिया, गैस वालों ने सिलिन्डर और पम्पवालों ने पेट्रोल और डिजल । आन्दोलन को अभी दस दिन भी नहीं बीता था कि बाजार में खाना बनाने के लिए आवश्यक एलपी गैस का अभाव हो गया । आम लोगों की तरह मैंने भी मिट्टी वाला एक हिटर खरीदा । लेकिन इस हिटर में खाना बनाना मतलब लोहे के चने चबाना था ।

काफी देर लग जाती थी तो मैने फिर एक इन्डेक्शन अर्थात विद्युतीय चुल्हा खरीद लिया । इस चुल्हे को खरीद लेने से खाना तैयार नहीं होता ,वरन इसके लिए अलग से बरतन चाहिए और चुल्हा , बर्तन सभी जोड़कर लगभग दस हजार खर्च हो गया । सोचा कि अब तो खाना बनाने में परेशानी नहीं होगी लेकिन सरकार अगर निकम्मी हो तो जनता को काफी परेशानी उठानी पड़ती है । और ऐसे ही हुआ आज मेरे घर में , सुबह साढ़े छः बजे जब मेरी आँख खुली तो बिजली नहीं थी और खाना समय पर बन नहीं पाया । बाह्र साल की मेरी बेटी जो कुछ ही दिन पहले बीमारी से उबर पायी है उसे बासी रोटी और सब्जी खिलाकर स्कूल भेजना पड़ा । डॉक्टर ने कहा है कि बीमारी के कारण वह कमजोर हो गयी है, उसे अभी पोषक खाना दें ।

सुनने में कहानी जैसी लगे लेकिन यह आज का सत्य है । राजधानी के हर एक घर में लोग दोनों शाम ठीक से खाना नहीं खा रहे है । गैस नहीं था तो , हिटर खरीदा, उससे भी नहीं तो इन्डेक्शन लेकिन जब बिजली ही नही हो तो ? आज घर में सबकुछ होते हुए बच्चा भूखा है और अपने भूखे बच्चों को देख कर माँ रो रही है । वास्तव में अत्यन्त दयनीय अवस्था से गुजर रहें हैै देश के आम लोग । और इन्धन की इस विकराल अवस्था में नेपाल विद्युत प्राधिकरण लोडसेडिङ बढ़ाने के लिए तावड़तोड़ कोशिश में लगा है । आज की बात की जाए तो सप्ताह में ५६ घन्टा लोडसेडिङ हो चुका है ।

आश्चर्य की बात तो यह है कि इतना सब हो जाने के बाद भी लोग चुप क्यों हैं ? पेट्रोल गर एक रुपया बढ जाता है तो तोड़फोड पर उतारु हो जानेवाली जनता क्यों चुप्पी साधे हुए है ? अपनी मांग पूरा न होने पर एक घन्टा के अन्दर पूरे देश को ठप्प कर देने वाली जनता मौन क्यों ? कभी चीन तो कभी बंगलादेश से इन्धन लाऐंगे कह कर सरकार साढ़े तीन महीने से जनता को धोखा दे रही है लेकिन कोई कुछ नहीं बोलता । स्वामिभान का स्वांग रचकर कुछ लोग मोज कर रहें है ये देखते हुए भी सभी शान्त । आखिर क्यों, क्या इस देश में जनता है ही नहीं, सभी के सभी राजनीतिक कार्यकर्ता है या नेता की तरह जनता में भी संवेदनशीलता खत्म हो गयी है ?

पिछले तीन महीने की समीक्षा की जाए तो यहाँ कालाबजारी संस्थागत हो गयी है । पेट्रोल पम्प में तेल नहीं मिलता लेकिन हर चौथे घर से पेट्रोल खरीदा जा सकता है । गैस वाला कहता है गैस नहीं है लेकिन १५ सौ रुपऐ का गैस ६ हजार से ८ हजार तक खर्च किया जाय तो जितना चाहे उतना मिल जाता है । बाजार में खाद्यान्न का दाम तीन गुना बढ गया है । कारण पुछो तो आसान सा जवाब होता है – बन्द के कारण । राजनीतिक दल के नेता, कार्यकर्ता, व्यापारी ,आन्दोनरत दल सभी के सभी कालाबजारी में लगें हुए हैं । शायद यह भी एक बड़ा कारण है कि समास्या का समाधान नहीं हो रहा है और राष्ट्र गंभीर मानवीय संकट की ओर आगे बढ़ रही है ।

बाजार में दवाई नहीं है, अस्पताल में ऑक्सीजन, क्लोफर्म और खून का अभाव हो गया है । लेकिन सरकार स्वाभिमान का भूठा रट लगा जनता की आँखो में धूल झोंक रही है । पिछले दिन राष्ट्रसंघीय बाल कोष ने सरकार का ध्यानाकर्षण करवाया है कि ३० लाख नेपाली बच्चे जोखिम में हैं । लेकिन किसी को क्या मतलब, जनता जीये या मरे बस अपनी कुर्सी नहीं छुटनी चाहिए, चाहे फिर राष्ट्र का ही बलि क्यों न देना पडे ।

और आज की बात की जाय तो नेपाल के सारे नेता दिल्ली दौड़ में लगें है । प्रधानमन्त्री के एक दुत कई दिनों से दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में घुम रहे हैं, पराराष्ट्रमन्त्री अभी अभी दिल्ली से वापस लौटें है, बड़े खुश नजर आ रहे थे, बाबुरामजी भी उधर ही हैं तो मधेशी मोर्चा ही क्यों पीछे रहे, वह भी बारात लेकर दिल्ली पहुँच गया है । अगर दिल्ली ही समस्या का हल है तो इतने दिनों तक दिल्ली को गाली क्यों ?

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