कञ्चना झा

अन्तर है बोलने में, विचार को रखने में, अन्तर है मानसिकता में, सोच में । और सही मायने में कहा जाय तो अन्तर होना मानविय गुण है लेकिन मन की बात को न मानकर जबरदस्ती अन्तर बना लेना गलत है । कुछ लोग ऐसा करतें है, खासकर नेतागण, विशेष स्वार्थ से पे्ररित हो कर वह गलत धारणा प्रवाह करतें है । वर्तमान नेपाल के लिए यही दुर्भाग्य बन गया है । नेतागणों का स्वाथपूर्ण अभिव्यक्ति के कारण आज नेपाल का मानसिकता बन गया है भारत का विरोध करना । आप जितना उग्र होकर भारत के विरोध में लिखेंगे ,बोलेंगे आप उतने अधिक राष्ट्रवादी । कुछ ही महीने पहले तो भारतीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेपाल भ्रमण के समय बहुत कुछ दिया हमने सप्रेम स्वीकार कर लिया , चाहे नेतागण हों या अखबार के हेडलाइन्स मोदी के गुणगाण करते थकते नहीं । लेकिन अचानक से क्या हो गया ?

बैशाख महीना में आए भूकंप ने नेपाल को हिलाकर रख दिया । नौ हजार से ज्यदा लोगों की जाने गयी और अरबों की सम्पति बर्बाद हो गइ । देश के अर्थतन्त्र पर बहुत गहरा असर पडा । जनता प्रतीक्षा में थे की सरकार अर्थतन्त्र को पुनर्जीवन देने के लिए कोइ प्याकेज लाएंगे लेकिन अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए कुछ दलों ने संविधान निर्माण प्रक्रिया को आगे बढ़ने की सहमती कर ली । और संविधान तैयार भी हो गया , लेकिन मधेश केन्द्रीत दलों ने संविधान के प्रति पहले से ही असन्तुष्टी जाहिर कर रहे थे । उनकी मांगों को अनसुना कर दिया गया और आज परिस्थति यह है कि तराई मधेश ९४ दिन से आन्दोलित है । आपनी मागों को रखते हुए जब मधेश के जनता ने शान्तिपूर्ण आन्दोलन किया तो उनपर गोली बरसायी गयी , ४० लोगों की जाने चली गयी । अन्ततः मधेशी जनता ने बह्रमास्त्र उठा लिया ।

जिसका परिणाम यह है कि राजधानी के लोग एक बुंद पेट्रोल को तरस रहें है । और सरकार जलावन बाँटने पर मजबुर हो गयी है । यद्यपि यह जलावन भी नेता और कार्यकर्ता के अलावा सर्वसाधारण को मिलनेवाला नहीं । अब समय आ गया है नेपाल के राजनेताओं को चाहिए कि देश की इस विषम परिस्थिति के संबन्ध में खुली बहस करे । लेकिन, मधेश आंदोलन को लेकर प्रधानमन्त्री केपी ओली बारम्बार एक ही बात दोहरा रहें हैं कि दो चार लोगों की मांग को सम्बोधन नहीं किया जाएगा । दो चार लोग का आन्दोलन होता तो तीन महीना नहीं चलता यह आन्दोलन । क्या सचमुच प्रधानमंत्री की नजरें नहीं पड़ रही है ऑन लाइन, पत्र पत्रिका, विभिन्न टी भी चैनल, रेडियों में दिन प्रतिदिन की खबरों पर या यह स्वीकार कर लें की प्रधानमन्त्री पढ़े लिखे नहीं । और अनपढ के साथ अपेक्षा क्यों ?

भारत को गाली देकर समस्या समाधान होने वाला होता है तो प्रधानमन्त्री राजधानी के टुडिखेल में भारत को गाली देने का एक कार्यक्रम आयोजना करें जिसमें हम सभी सहभागी हों । स्वाभिमान का ढोंग रचकर सस्ती लोकप्रियता के चक्कर में देश को बर्बाद न करें ।
आज देश इतिहास के सबसे बड़े संक्रमण के स्थिति में है । विविधता इस राष्ट्र की सम्पति थी लेकिन आज यही विविधता समस्या बन गया है । लोग अपने आप को नेपाली न कह कर पहाडी, मधेशी, जनजाति, आदीवासी कहने लगें है , समय पर इसे संबोधन नहीं किया गया तो राष्ट्र छिन्न भिन्न हो जाने के संकेत भी आने लगें है ।

जहाँ तक रही मधेश आन्दोलन में भारत की भूमिका  की, तो बात बिल्कुल साफ है– घर के झगडे को घर में ही सुलझा लेना चाहिए । घर की समस्याओं को लेकर चौक चौराहा पर में आएगें तो लोग अपने हिसाब से हस्तक्षेप करेंगें ही । दिल्ली के साथ काठमान्डू का क्या संबन्ध है ये बड़े लोगो जाने लेकिन इसमें कोई दो मत नहीं की मधेश के हर घर में भारत के साथ रिश्ता है । और जब अपने रिश्तेदारों के साथ अन्याय होगा तो कोई चुपचाप बैठने वाला नहीं । मधेश के आन्दोलन में भारत के सीमावर्ती क्षेत्रों के लोगों ने सहयोग किया है । जब नेपाल पुलिस अत्याचार कर रहे थे तो उन्होंने रहने के लिए जगह दिया आन्दोलन कारी को खाना भी खिलाया । ऐसा सहयोग करने वाला भारत नहीं बल्कि भारत में रहने वालो हमारे रिश्तेदारों ने की है । अगर नहीं करते तो वो अच्छे रिश्तेदार भी नहीं कहलाते ।

सीमावर्ती शहर वीरगंज में पुलिस के गोली लगने से एक भारतीय नागरिक की मृत्यु को लेकर आन्दोलन भारत करवा रहा है कहना गलत है । बैशाख १२ गते जो भूकंप आया था उसमें सौ से ज्यादा विदेशी लोगों की जाने गयी । फ्रान्स की राजधानी पेरिस में हुए आतंकवादी आक्रमण में सिर्फ फ्रान्स ही नहीं वरन कई देश के लोग मारे गये । यातायात और सञ्चार की सहजता ने पूरे विश्व को एक गाँव बना दिया है ।

पिछले दिनों नेपाल के लिए भारतीय राजदूत रंजीत रे ने बहुत ही अच्छी बात कही– शायद यहाँ की मानसिकता ही हो गई है विरोध करने की । आप कुछ भी करें ये विरोध ही करेंगे । भूकम्प के समय की बात करते हुए उन्होंने कहा कि भारत ने नेपाल को अपना अभिन्न मित्र मानते हुए इसकी सहायता की , लेकिन यहाँ इसबात को इस तरह से उछाला गया कि…… अब बहस न ही हो तो बेहतर है ।

पड़ोसी का तो मतलब ही होता है एक दूसरे का बुरे वक्त में साथ देना । भारतीय राजदूत ने आगे कहा है कि कारण चाहे जो भी रहा हो जनता आंदोलित है मतलब साफ है समस्या है और समाधान की आवश्यकता है । वास्तव में अपने कमजोरी को छिपाने के लिए किसी राष्ट्र को घसिटना अच्छा नहीं । स्वाभिमान बहुत ही अच्छी बात है लेकिन किचेन में ग्यास न हो तो स्वाभिमान सिर्फ नारा बनकर रह जाएगा ।

स्वाभिमान के इस ढोंग के संबन्ध में फेस बुक पर एक मित्र ने लिखा– हम नेपाली बड़े स्वाभिमानी हैं तो वापस कर दें अभी तक जितने भी सामान लिये वह सब ,  अस्पताल के लिए एम्बुलेंस, विद्यालय की भवन, पुरव पश्चिम राजमार्ग, अनुदान की राशि । और सबसे बडी बात तो यह है जो नेतागण आज सबसे उँची स्वर में स्वाभिमान की बात करतें है उनके बच्चे भारतीय छात्रवृति योजना अन्तर पढ़कर डॉक्टर इन्जिनियर बनें है । कई नेतागण बीमार होने के बाद भारतीय सहयोग लेकर दिल्ली के मंहगे अस्पताल में मुफ्त में ईलाज करवा रहे हैं । क्या हम वापस कर सकते है यह सभी चिज ? और अगर नहीं तो भारत को गाली देने का हक नहीं बनता इन लोगों को ।

इसका मतलब यह भी नहीं भारत के सामने हम नतमस्तक हो जायें । नेपाल एक स्वाधिन राष्ट्र है और यहाँ की समस्या हमारी है । हमें मिलकर इसका समाधान ढुंढना चाहिए । कुछ भी ऐसी क्रियाकलाप नहीं करनी चाहिए कि पड़ोसी के साथ संबन्ध खराब हो । और उसमें भी भारत के साथ क्योंकि भारत केवल हमारा पड़ोसी ही नहीं बल्कि परिवार है ।

1 COMMENT

  1. Madhesiyouth.com UNMIN Official Documents – Peace Process: 22- Point Agreement Between GoN and MJF [.pdf] [in English] – Translated by UN Mission in Nepal (UNMIN)
    8-Point Agreement Between GoN and UDMF [.pdf] [in English] – Translated by UN Mission in Nepal (UNMIN) . If Nepal govt. do not want to accept the agreement with madheshi morcha , then 12-point Peace agreement and all agreements with maoist should be rejected also .

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