कञ्चना झा
कुछ दिन पहले की एक घटना का जिक्र कर रही हूँ । कुछ बच्चे आपस में खेल रहे थे और एक दूसरे को पूछ रहे थे कि भविष्य में कौन क्या क्या बनेगा ? पाँच बच्चों में तीन ने जबाब दिया कि वो देश के प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं । आमतौर से गर किसी बच्चे से पूछा जाए कि आगे जाकर वह क्या बनना चाहता है तो जवाब आता है– डॉक्टर ,इन्जिनियर, पाइलट, चार्टर्ड एकाउन्टेन्ट लेकिन ये बच्चे बिल्कुल भिन्न । एक कौतुहलता सी हुई, रहा नहीं गया पूछ बैठी कि तुम क्यों प्रधानमंत्री बनना चाहते हो ? बड़े भोलेपन से बच्चे ने जबाब दिया पढ़ना नहीं पड़ेगा । वैसे देखा जाए तो बच्चे तो बच्चे हैं लेकिन भोलेपन में बच्चा बहुत कुछ कह गया ।
देखाजाय तो, प्रधानमंत्री तो देश को नेतृत्व प्रदान करता है । ऐसे पद पर बहुत ही जिम्मेवार व्यक्तित्व को आना चाहिए । शायद इसलिए संविधान बनने के समय में लोगों ने सुझाव भी दिया था कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री या और गरिमामय पदों के लिए एक मापदण्ड रखी जाए । ताकि ऐसे पदों पर बुद्धिजीवी, विवेकशील लोग आगे आ सके और देश को एक नयी दिशा मिल सके । लेकिन जनता की आवाज को नहीं सुना गया । परिणाम यह है कि आज की तारीख में हम गर्व के साथ अपने नेतृत्व का नाम नहीं ले सकते हैं । जिन्हे नेतृत्व में लाया गया है, अधिकांश अन्डर एसएलसी है । इसका मतलब यह नहीं कि जो बहुत पढे लिखें होते है वह नेतृत्व भी अच्छा कर ले, लेकिन एक बात तो है, अध्ययन ज्ञान देता है, समझ देता है और ज्ञान और समझ लोगों को विवेक प्रदान करता है । नेतृत्व ऐसी होनी चाहिए कि आम जनता उसको आदर्श मानें , उसकी राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक चरित्र निष्कलंक हो, लेकिन दुर्भाग्य अंक गणित के राजनीति ने इस देश के साथ अन्याय किया है ।
और शायद यही कारण है शांतिप्रिय कहलाने वाला नेपाल आज हिंसा के चपेट में है । देश का आधा हिस्सा आन्दोलित है । करीब तीन महीने होने लगे तराई मधेश ठप्प है । स्कूल, कॉलेज बन्द है, उद्योग व्यवसाय धरासायी हो गया है, अस्पतालों में दवाईयां नहीं है । दूसरी ओर आधा देश अभाव में जी रहा है । शहर की मेरुदण्ड मानी जाने वाली सडकें खाली है । पाँच सौ रुपए के पेट्रोल की उम्मीद में लोग पाँच दिन से लाइन में लगे हुए है । राजधानी के लोग जलावन पर खाना पका रहें है । बाजार में खाद्यान्न और दैनिक उपभोग्य बस्तु की किमतें आसमान छु रही है । बाजार विकृत हो गया है लेकिन इसे नियन्त्रण में लाने के लिए किसी तरह कोई प्रयास नहीं हो रहा है । इस दौरान करीब पाँच खर्ब रुपये का प्रत्यक्ष नुकसान हो चुका है । अप्रत्यक्ष नुकसान की बात ही न करे । हर जगह एक ही बात चल रही है, आपके घर में ग्यास है कि नहीं ? गाड़ी में पेट्रोल है कि नहीं ?, आज पेट्रोल कहाँ मिलने वाला है ? यानि देश का पूरा जनसंख्या पेट्रोल और ग्यास के चक्कर में है । सोचनेवाली बात यही है कि पूरी जनसंख्या लाईन में खड़ी है तो काम कब करेंगे ?और काम नहीं करेंगे तो देश के अर्थव्यवस्था का क्या होगा ?
समस्या गर यही खत्म हो जाती तो कुछ और बात होती ,लेकिन कहते हैं ना कि समस्या जब भी आती है चारों ओर से आती है । एक समस्या से तो अभी उबरे भी न थे कि देश इतनी बड़ी समस्या में आ गया है जिसका अंत क्या होगा शायद ही कोई जबाब दे सके।
नेपाल के आगे दूसरा और अत्यन्त गंभीर समस्या है, भुकम्प प्रभावित क्षेत्र में पुनर्निर्माण । संयुक्त राष्ट्र संघ सहित अन्तर्राष्ट्रीय समुदाय हर रोज चेतावनी दे रहा है कि भुकम्प प्रभावित क्षेत्र में गम्भिर मानविय संकट आनेवाला है । ठंड की शुरुवात हो चुकी है और भुकम्प प्रभावित क्षेत्रों में लोगों को सर छिपाने के लिए छत नहीं, बच्चों के पास गर्म कपडे नहीं और पेट भरने के लिए पर्याप्त खाद्यान्न नहीं । लेकिन नेतृत्व को इन सभी समस्याओं से कोई मतलब नहीं । वह तो बस स्वाभिमान और राष्ट्रवाद की बात कर रहा है । स्वाभिमान और राष्ट्रवाद की भावना केवल नारे से नहीं आती है , कहते हैं जब बात पेट पर आ जाती है तो कोई राष्ट्रीयता ,कोई स्वाभिमान नहीं । यह तो तभी संभव है जब देश का प्रत्येक नागरिक सबल ,संबृद्ध हो । झूठ और केवल नारा के बल पर पर बनाया गया राष्ट्रवाद दीर्घकालिन नहीं हो सकता है ।
प्रधानमंत्री केपी ओली इन समस्याओं का समाधान कैसे करते है यह तो देखना बाकी है लेकिन अभाव में जी रहे जनता को स्वाभिमान और राष्ट्रीयता का जामा पहनाने में वह तत्कालिन रुप से सफल दिख रहे हैं । बालुवाटारस्थित प्रधानमंत्री क्वार्टर में बैठ कर खुद मजे ले रहे हैं और करीब तीन महीना बित जाने के बाद भी वह अपने देश के जनता की आवाज को नहीं सुन पा रहें हैं । फिलहाल वो पद के बँटबारे में लगें हैं । देश को हास्यास्पद स्थिति में तो लाकर खड़ा कर ही दिया है लेकिन जरा भी परवाह नहीं । असली समस्या क्या है उसके तह तक वो जाना ही नहीं चाहते न ही उनके साथ बैठ कर उनकी समस्याओं को जानने का प्रयास कर रहें हैं । फूलमाला पहनने के लिए अपने जिला पहुँच चुके हैंं लेकिन तराई मधेश के जनता के साथ बात नहीं करते ।
वास्तव में एक अच्छा प्रधानमंत्री वह है जिसमें देश को समेट कर विकास के पथ पर आगे ले जाने का क्षमता हो , व्यक्तिगत और पार्टीगत स्वार्थ से उपर उठकर , राष्ट्र के संबन्ध में सोचे । लेकिन वर्तमान प्रधानमन्त्री देश को खण्डित करने में लगे हैं । अपनी कमजोरियों को छिपाने के लिए दूसरों पर आरोप लगा रहें हैं । हो सकता है, भारत का अपना हित हो लेकिन मधेश के लोग भारत के लिए नहीं वरन अपने हक अपने अधिकार के लिए आन्दोलन कर रहे है । उनकी मांग भी बहुत बड़ी नहीं, उनका कहना इतना ही है कि उनके साथ विभेद नहीं हो, गणतान्त्रिक संविधान ऐसा बने जिससे उन्हे भी अपनत्व का भावना जागृत हो । क्या मधेश का यह बात कहना गलत है ? लेकिन नेतृत्व ने मधेश की जनता की आवाज को कभी नहीं सुना । और आज जो हो रहा है कुछ भी अस्वाभाविक नहीं । बुजुर्गों ने ऐसे ही थोडे ही कहा है– घर फुटे गवाँर लुटे ।
अच्छा नेतृत्व अपने जनता प्रति ईमानदार होता है, वह सटिक तथा समझदारी पूर्ण निर्णय लेकर जनभावनाओं का सम्मान करता है, देश के प्रत्येक भाग को एक समझकर फैसला लेता है । देश का नेतृत्व अभी केपी ओली के हाथ में है । प्रधानमन्त्री ओली को एक ऐतिहासिक अवसर मिला है देखना यह है कि वो इस अवसर का कितना उपयोग करते हैं ?



