कञ्चना झा
लगभग ढ़ाई वर्ष पहले की बात है देश में संविधान सभा का चुनाव होनेवाला था, और सभी अपने अपने मत का प्रयोग करना चाहते थे । लेकिन नियमानुसार आम नागरिक को मतदान करने के लिए अपना जिला जाना पड़ता । ऐसे मेें मेरे एक मित्र ने फेसबुक के वाल पर लिखा था कि चार हजार रुपए खर्च कर मैं मतदान करने नहीं जाउँगा । उस वक्त मैंने सोचा था कि कैसी मानसिकता है ये जहाँ लोग अपने मताधिकार प्रयोग करना नहीं चाहते । लोकतन्त्र का सबसे बडा उपहार ही निर्वाचन है जिसके द्धारा अपने प्रतिनिधियों को हम नीति निर्माण के लिए भेज सकतें है । और ऐसे स्वर्णिम अवसर को लोग पैसे के साथ तौल रहें है । वैसे मित्र ने आगे लिखा था– जब तक ‘इनमें से कोई भी नहीं’ विकल्प नहीं दिया जाऐगा मैं मतदान नहीँ करुंगा ।
फेसबुक तो फेसबुक है, जिसको जो मन में आया लिख देता है यही सोच कर मंैने खास ध्यान नहीं दिया मित्र की बात पर । सही में उस समय मैंने बहुत गहराई से नहीं सोचा ,लेकिन बात अब समझ में आई जब आज देश इस दौर से गुजर रहा है । बार बार मन में एक ही सवाल उठ रहा है कि कहीं हम आम जनता ही तो नहीं देश की इस स्थिति के जिम्मेदार हैं । जी हाँ, शत प्रतिशत हम और आप ही जिम्मेदार हैं क्योंकि ये नेता कहीं बाहर से नहीं यहीं की मिट्टी अर्थात इसी नेपाल देश से हैं और इनका चुनाव किसी और ने नहीं वरन हमने ही किया है तो दोषारोपण क्यों ? नेता स्वार्थी ,लालची ,कुर्सीप्रिय ,अपनी वादों से मुखरने वाले होते हैं सबको पता है लेकिन फिर भी हम उन्हीं को चुनकर लाते हैैं तो गलती किसकी ? हमने जिन्हें चुनकर भेजा, जैसों को भेजा वैसा ही फल भी मिलेगा ।
७२ दिनों के आंदोलन के बाद भी आज हमारे हाथ क्या आया है, कुछ भी नहीं । एक कहावत है अंधेर नगरी चौपट राजा शायद आज के संदर्भ में ही किसी ने लिखा होगा । जबकि सारा विश्व चाँद सितारे मंगल की बात करते हैं । हम और आप जलावन, घासलेट, साईकिल, पैदल चलने की बात कर रहे हैं । पूरा विश्व आगे बढ़ने की सोचता है । हम और आप पचास साल पहले की बातों को अपनाने की सोच रहें हैं ।
सोचे भी क्यों ना आखिर स्वाभिमान की जो बात है । हम और आप तो पहले भी बेचारे थे आज भी बेचारे ही हैं क्योंकि कल भी चुपचाप तमाशा देखते थे आज भी चुपचाप तमाशा देख रहें हैं । आज इतने मुश्किलों में होते हुए भी जनता एक उफ तक नहीं कर रही है ।
भूmठे स्वाभिमान की आग में जनता को झोंक देने के बाद सभी नेता अपनी अपनी रोटियां सेंकने में लगे हैं । उन्हें जरा सी भी चिंता अपने देश और अपनी जनता की नहीं है । मजाक बना कर रख दिया है हमने इस स्वाभिमान शब्द को । जहाँ चार लोग जमा होते हैं वहाँ अपनी अपनी तकलीफों को बयान करते थकते नहीं । किसी की गाड़ी में पेट्रॉल नहीं तो किसी के घर आज फिर चुल्हा नहीं जला । बच्चों ने आज फिर बिस्कुट और चाउचाउ खाकर दिन बिताया । किसी की माँ बीमार है मगर अस्पताल नहीं लेकर जा सकता क्योंकि गाड़ी में पेट्रॉल नहीं है । अच्छा स्वाभिमान है ।
मधेश बंद हैं, बच्चों का स्कूल बंद है, लोग ऑफिस नहीं जा पा रहें हैं । घर में बैठने को मजबूर हैं । आम आदमी का हाल बेहाल है । फिर भी हम स्वाभिमानी हैं । एक को छोड़कर दूसरे का मुँह ताक रहें हैं और कह रहें हैं आखिर हममें भी स्वाभिमान है । और इसी स्वाभिमान को लेकर रोज फेसबुक पर लोग लिखते हैं । आज हमने पहलीबार मिट्टी का चुल्हा जलाया बड़ा आनंद आया । उसपर लोग कामेंट लिखते हैं –अरे तुमने शुरु कर दिया । दूसरा –मैं भी सोच रहा हूं । तीसरा –अरे यार लकडी कहाँ से लाये मुझे भी आईडिया दो । चौथा– अरे मैं तो पागल हो जाउँगा । मेरी पत्नी को चुल्हा जलाना नहीं आता । ये है हमारा स्वाभिमान । घर की महिलाओं को हर वक्त एक ही डर कि अब क्या होगा । गर स्थिति अच्छी नहीं हुई तो कैसे चलेगा । घर में एक वक्त ही चुल्हा जल रहा है । इतना होने के बाद भी हम स्वाभिमानी हैं और चुप है । क्यों ? क्या सिर्फ इसलिए नहीं कि गलती हमारी है । गर हमारी गलती नहीं रहती तो आज कोई अपने घर में नहीं वरन सड़क पर होता कि तुम नेताओं ने अपने स्वार्थ और लालच में आकर पूरे देश को मिट्टी में मिला दिया है ।




ek dam sahi bath,,,,,,,
and aur aaj vi in pagl neta ke pichhe bhag rahe hae…
un neta beta or beta videsh me padh raha hae and hum janta ka school/clz band hai
ek line “aapna kam banta var me jaye janta”
or sab ka jemewar hum janta vi lavag utana hi hai jitana neta log,,,,,,,,,
khokhla swaviman neta beiman.